यद्यद्विभूतिमत्सत्त्वं श्रीमदूर्जितमेव वा। तत्तदेवावगच्छ त्वं मम तेजोंऽशसंभवम्।।10.41।।
yad yad vibhūtimat sattvaṁ śhrīmad ūrjitam eva vā tat tad evāvagachchha tvaṁ mama tejo ’nśha-sambhavam
yat yat—whatever; vibhūtimat—opulent; sattvam—being; śhrī-mat—beautiful; ūrjitam—glorious; eva—also; vā—or; tat tat—all that; eva—only; avagachchha—know; tvam—you; mama—my; tejaḥ-anśha-sambhavam—splendor; anśha—a part; sambhavam—born of
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In English by Swami Adidevananda
Whatever being is possessed of power, or splendour, or energy, know that as coming from a fragment of My power.
In English by Swami Sivananda
Whatever being there is glorious, prosperous, or powerful, know that to be a manifestation of a part of My splendor.
In Hindi by Swami Ramsukhdas
।।10.41।। जो-जो ऐश्वर्ययुक्त, शोभायुक्त और बलयुक्त प्राणी तथा वस्तु है, उस-उसको तुम मेरे ही तेज-(योग-) के अंशसे उत्पन्न हुई समझो।
In English by Swami Sivananda
10.41 यत् यत् whatever, विभूतिमत् glorious, सत्त्वम् being, श्रीमत् prosperous, ऊर्जितम् powerful, एव also, वा or, तत् तत् that, एव only, अवगच्छ know, त्वम् thou, मम My, तेजोंऽशसंभवम् a manifestation of a part of My splendour.No Commentary.
In Hindi by Swami Ramsukhdas
।।10.41।। व्याख्या--'यद्यद्विभूतिमत्सत्त्वं श्रीमदूर्जितमेव वा'--संसारमात्रमें जिस-किसी सजी-वनिर्जीव वस्तु, व्यक्ति, घटना, परिस्थिति, गुण, भाव, क्रिया आदिमें जो कुछ ऐश्वर्य दीखे, शोभा या सौन्दर्य दीखे, बलवत्ता दीखे, तथा जो कुछ भी विशेषता, विलक्षणता, योग्यता दीखे, उन सबको मेरे तेजके किसी एक अंशसे उत्पन्न हुई जानो। तात्पर्य है कि उनमें वह विलक्षणता मेरे योगसे, सामर्थ्यसे, प्रभावसे ही आयी है -- ऐसा तुम समझो -- 'तत्तदेवावगच्छ त्वं मम तेजोंऽशसम्भवम्'। मेरे बिना कहीं भी और कुछ भी विलक्षणता नहीं है।